Friday, 20 March 2009

हवा की तरह

खुद में वह कुछ नहीं है, पर वह है, तभी तो जीवन है। उसका अपना कोई रंग नहीं। धूल का कोई गुबार उठे, तो उस गुबार का रंग हवा में दिखने लगता है। उसकी कोई गंध नहीं। फूलों की बगिया से निकलती है, तो सारा माहौल महक उठता है। किसी गंदे नाले के करीब से होकर गुजरने पर वह दुर्गंध को अपने संग इसलिए ले चलती है कि सुगंध-दुर्गंध का फर्क तो अज्ञानी करते हैं। हवा के चलने में अपना कोई स्वार्थ नहीं होता। वायुमंडल में कहीं कोई शून्य पैदा होता है, तो हवा उसे भरने भागती है। एक ओर वह विशाल बादलों को यहां से वहां ठेलती है, तो दूसरी ओर हर जीवित छोटे से छोटे प्राणी की सांस का अवलंब बनती है। और कमाल देखिए कि जहां वह न हो, तो यह सुविधा उसके साथ जुड़ी है कि हाथ से पंखे को जरा सा इधर-उधर हांकिए और पैदा कर लीजिए हवा। बिजली की तरह उसे पैदा करने में कोई खास जतन नहीं करना पड़ता। कोई कीमत नहीं मांगती हवा। पर जितनी आसान है हवा, उतना ही मुश्किल है हवा की तरह होना।

संजय वर्मा

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