Friday, 6 March 2009

रहस्य और भय

अंतरिक्ष के बहुत  से रहस्य अभी खुलने बाकी हैं। स्पेस के बारे में हम रोज ही कोई न कोई नई जानकारी पाते हैं। इन जानकारियों से अंतरिक्ष के बारे में हमारे ज्ञान का दायरा बढ़ा है और आगे भी बढ़ेगा। क्या स्पेस में कहीं जीवन है या अगर कहीं जीवन था, तो वह कैसे खत्म हुआ- इसका पता चलेगा। दूसरी तमाम जानकारियों की तरह ही अंतरिक्ष के बारे में मिलती नई-नई सूचनाएं भी सभ्यता को और उन्नत और सुरक्षित बनाती हैं।

पर दूसरी तरफ यह भी लगता है कि इनसे हमारे भीतर का भय और कुछ हद तक एक तरह का अंधविश्वास भी बढ़ रहा है। अंतरिक्ष में घूमता हर ज्ञात एस्टेरॉयड मानो पृथ्वी से टकराकर हमें नष्ट करने वाला है। मंगल या दूसरे ग्रहों पर जब पानी के सूख जाने के प्रमाण मिलते हैं, तो लगता है कि ऐसा एक दिन पृथ्वी पर भी होने वाला है।

हमारी स्थिति उस अबोध शिशु की तरह है, जिसे सर्प से तब तक कोई भय प्रतीत नहीं होता, जब तक उसे खतरे का अहसास नहीं कराया जाता। और जब एक बार वह सांप के खतरे से परिचित हो जाता है, तो वह विषहीन सांपों से भी डरने लगता है। अंतरिक्ष से हम इसलिए भयभीत होते हैं, क्योंकि उसके बारे में हमारा ज्ञान आधा-अधूरा है। लेकिन ज्ञान कभी पूर्ण भी नहीं होता।

संजय वर्मा

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