Tuesday, 24 March 2009

सच के चेहरे

सत्य और असत्य के संघर्ष की खूब बातें की जाती हैं। धर्मशास्त्रों से लेकर साहित्य तक का बुनि यादी विषय यही रहा है। लेकिन दुनिया में लड़ाई सिर्फ सत्य और असत्य के बीच नहीं है, बल्कि सत्य और सत्य के बीच भी है। हम एक सत्य को लेकर आगे बढ़ें तो मुमकिन है कोई हमारा विरोध दूसरे सत्य से करे। सत्य का कोई एक रूप नहीं होता। उसके भी कई चेहरे होते हैं। चूंकि जीवन में कसौटियां भी कई हैं, इसलिए सच के रूप भी अनेक हैं। किसी पुरानी पीढ़ी के व्यक्ति की कोई बात सच हो सकती है, लेकिन यह कोई जरूरी नहीं कि उसकी वह बात नई पीढ़ी का कोई व्यक्ति स्वीकार ही कर ले। दोनों अपनी-अपनी कसौटियों पर सही हो सकते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे को स्वीकार नहीं कर पाते। कई बार किसी खास समय में कोई सच ज्यादा प्रासंगिक और प्रभावी हो जाता है, जबकि कोई और सच गौण हो जाता है। इसलिए हम एक सच को स्वीकार करने के बावजूद उसे सामने नहीं लाना चाहते। हम उसी सच के साथ खड़े होते हैं, जो वर्तमान में हमारे काम आता है।

संजय कुंदन