एक दिन दिल्ली की एक पुरानी कोठी के पास से गुजरते हुए कोयल के कूकने की आवाज सुनी। अद्भूत अनुभव था यह। याद नहीं आ रहा था कि कितने सालों के बाद सुना था कोयल का इस तरह कूकना। अकस्मात कुछ काव्य पंक्तियां कौंध गईं। कोयल के बारे में सोचते हुए कालिदास याद आते हैं। उनकी रचनाओं में आम्र मंजरियां खूब आती हैं। अब दिल्ली में आम्र मंजरियों का सुख तो फॉर्म हाउस वाले ही उठा सकते हैं। आम आदमी के जीवन में न तो आम के बगीचे हैं न कोयल जैसे दूसरे पक्षी। ऐसा भी नहीं है कि महानगर में पक्षी हैं ही नहीं। उन्हें देखने वाली आंख चाहिए। दिल्ली गेट पर कबूतरों की पांत हमारा मन मोह लेती है। पर हमारे पास इतना समय कहां है कि हम ठहरकर उनका उड़ना-चहकना देखें और उल्लसित हों। हमारे सुख के संदर्भ बदल गए हैं। हम प्रकृति और उसके उपादानों में अपने लिए सुख की तलाश नहीं करते। शहरों के पार्कों में भी हमारा ध्यान पेड़ और चिड़ियों पर नहीं रहता, वहां भी हम चिप्स खाने, कोल्ड ड्रिंक्स पीने या अपने भौतिक जीवन की चिंताओं में निमग्न हो जाते हैं।
संजय कुंदन

0 comments:
Post a Comment