कई लोग मानते हैं कि एक-दूसरे से आगे निकलने की हड़बड़ी ने ही हमारा सुख-चैन छीन लिया है। चूंकि आजकल हर आदमी एक होड़ में शामिल है, इसलिए वह हरदम तनाव में रहता है। तो क्या प्रतिद्वंद्विता समाप्त हो जाने पर मनुष्य के सारे दुख समाप्त हो जाएंगे? कहना मुश्किल है, लेकिन जो लोग होड़ को गलत मानते हैं उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि आगे बढ़ने के लिए कोई लक्ष्य जरूरी है। लक्ष्य हवा में नहीं पैदा होते। उसके बनने में कई चीजों का योगदान होता है। हम किसी को देखकर उसके जैसा बनना चाहते हैं और यही इच्छा हमारा मकसद तय करती है। अगर कोई प्रतिद्वंद्वी ही न हो तो आगे बढ़ने की ललक नहीं पैदा होगी। किसी दबाव के अभाव में आदमी शिथिल पड़ने लगता है और बड़े काम करने से कतराता है। फिर वह जोखिम नहीं लेता और सुविधाजनक रास्ते तलाशने लगता है। इसलिए किसी प्रतिद्वंद्वी का होना भी जरूरी है। हम जिसे अपना आदर्श मानते हैं वह दरअसल हमारा प्रतिद्वंद्वी होता है। हम उसी के जैसा बनना चाहते हैं या उससे आगे निकलना चाहते हैं। होड़ ने सभ्यता को आगे बढ़ाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
संजय कुंदन
Saturday, 21 March 2009
होड़ भी जरूरी है
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