Thursday, 19 March 2009

कबूतरबाज हीरो

हो सकता है बरसों बाद लोग किताबों में बाबूभाई कटारा का जिक्र पढ़ें और
हैरान हो जाएं। इसलिए नहीं कि एक सांसद ने कबूतरबाजी की यानी लोगों को
अवैध तरीके से विदेश ले जाने का गुनाह किया, बल्कि इसलिए कि सन 2007 में
सीमाओं के आरपार लोगों की आवाजाही पर पाबंदी हुआ करती थी। दरअसल एक दिन
कबूतरबाजी रहेगी ही नहीं, क्योंकि सीमाएं खुल चुकी होंगी और लोग बिना
किसी रोक-टोक के उन्हें पार कर रहे होंगे। मसलन एक जमाना था जब गुलामी भी
कानूनी थी, जो आज हमें एक गलत प्रथा लगती है। इस लिहाज से देखें तो कटारा
जैसे लोग एक ऐसे सिस्टम को तोड़ रहे हैं, जो होना ही नहीं चाहिए था और एक
दिन रहेगा भी नहीं। हो सकता है तब कटारा को बदलाव का हीरो माना जाए।
कबूतरबाजों का कसूर यह है कि वे पाबंदी वाले इस सिस्टम को तोड़ने का काम
निजी फायदे के लिए कर रहे हैं। लेकिन अपराध तो यह इसीलिए है न, क्योंकि
एक गलत सिस्टम मौजूद है।

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