मानव विकास के संबंध में जुटाए जाने वाले आंकड़ों और सर्वेक्षणों के जरिए आंकी जाने वाली गरीबी से जुड़े तथ्यों में यह बात कई बार सामने आती है कि दुनिया में असंख्य लोग हैं, जिनके पास जीवन यापन के लिए कुछ नहीं है। 'कुछ नहीं' की परिभाषा में घर-मकान, कपड़े-लत्ते और ऐसा रोजगार शामिल किया जाता है, जो नियमित आमदनी कराए। जाहिर है, इन चीजों के अभाव में हम ऐसे लोगों को घोर गरीब मान लेते हैं। पर क्या वे हर दृष्टि से गरीब होते हैं? जिनके पास कुछ नहीं होता, कई सर्वेक्षण दर्शाते हैं कि वे दुनिया के सर्वाधिक अमीरों से ज्यादा प्रसन्न रहते हैं। इसीलिए यह जानने की कोशिश होती है कि जिनके पास कुछ नहीं है, उनके पास खुश होने को क्या है? अक्सर यह खोज बिना किसी नतीजे पर पहुंचे खत्म हो जाती है। दरअसल, जिनके पास कुछ नहीं होता, उनकी खुशी का कारण यही है कि उनके पास खोने को कुछ नहीं होता। खोने को कुछ नहीं होने के अहसास को हम तभी महसूस कर सकते हैं, जब हमारे पास वास्तव में कुछ न हो। पर क्या हम ऐसी खुशी पाने के लिए अपना बहुत कुछ दांव लगाने को तैयार हो सकते हैं?
संजय वर्मा
Tuesday, 24 March 2009
जिसके पास कुछ नहीं है
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1 comments:
apki jaankari se sehmat hote hue jankari dena chahoonga ki "Bangladesh vishw ka sabse prasaan desh hai".
aur apki post ka title padhke sehsa hi ek sher yaad aa gaya:
Dil bhi zid pe ada hai bacche ki tarah,
Ya to chahie ise sab kuch, ya kuch bhi nahi.....
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