Friday, 6 March 2009

अव्यावहारिकता की जरूरत

आजकल व्यावहारिक होने  पर बड़ा जोर है। व्यावहारिकता का तकाजा यह है कि व्यक्ति रोजमर्रा जीवन का हर कार्य एक निश्चित व्यवस्था के तहत करे। व्यावहारिक लोग आमतौर पर सामाजिक नियमों-कायदों और रीतियों का आंख मूंदकर पालन करते हैं। किसी को व्यावहारिक कहने में यह भाव रहता है कि वह भावना की बजाय बुद्धि को महत्व देता है, लीक से हटकर नहीं चलता क्योंकि उसमें जोखिम है।

एक तरह से देखा जाए तो व्यावहारिक होने का अर्थ है जोखिम न लेना। माना जाता है कि जो जोखिम लेगा वह गिर सकता है, नाकामयाब हो सकता है। इसलिए कहा जाता है कि प्रैक्टिकल बनो। लेकिन गौर करने की जरूरत है कि यह सभ्यता तभी आगे बढ़ी जब लोगों ने रिस्क लिए। जो लीक छोड़कर चले उन्होंने ही नई लीक बनाई जिस पर आज दुनिया चल रही है।

व्यावहारिक आदमी की मुश्किल यह है कि वह नाप-जोख कर चलता है। वह अपनी कल्पना को ताले में बंद रखता है, वह कई बार अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल तक नहीं करता। वह अपनी हर योजना किसी न किसी सांचे को ध्यान में रखकर बनाता है। इसलिए ऐसे लोग छोटी-मोटी उपलब्धियां तो पा लेते हैं, लेकिन कोई बड़ा काम नहीं कर पाते। जीवन में थोड़ी अव्यावहारिकता भी जरूरी है।

संजय कुंदन 

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