जीवन में जो चीजें और बातें सबसे सरल दिखती हैं, वे असल में उतनी सरल नहीं होतीं, जितना हम उन्हें मानने लगते हैं। जैसे कि दो का पहाड़ा। एक वयस्क, अनुभवी,पढ़ेलिखे व्यक्ति से दो का पहाड़ा सुनाने को कहना मानो उसकी हंसी उड़ाना है। पर जरा उसी व्यक्ति को उसके बचपन में देखिए। मां ने, पिता ने या घर के बड़े-बुजुर्गों में से किसी ने उसे उसके बालपन में बड़ी कोशिशों से दो का सरल दिखने वाला पहाड़ा याद कराया होगा। इसी तरह, स्लेट पर उसने अनगिनत बार जो आड़ी-तिरछी रेखाएं खींची होंगी, उन्हें अक्षरों की शक्ल में ढालना खुद उसे पहाड़ खोदने जैसा काम लगा होगा। अपने पांवों पर उठ खड़ा होना और चलना शुरू करना या आगे चलकर साइकल का संतुलन साधना और उसे चलाना- ये सब भी उस वक्त महान चुनौतियां रही होंगीं। पर उस वक्त इन्हीं कठिन दिखने वाली बातों के आधार पर आगे के सारे काम आसान होते चले जाते हैं और एक दिन दो का पहाड़ा बेहद तुच्छ लगने लगता है। असल में सरलता को समझना और सरल होना ही सबसे कठिन बात है। यहां तक कि इंसान की सरलता भी दो के पहाड़े जितनी ही कठिन है।
Friday, 20 March 2009
सरल नहीं, कठिन
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1 comments:
इस चिट्ठे का दर्शन अच्छा लगा।
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